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*इस्तेमाल किए हुए खाना पकाने तेल के पुनः उपयोग करने संबंध में मानवाधिकार आयोग ने एफएसएसएआई को जारी किया नोटिस* *दो सप्ताह के भीतर राज्यवार रिपोर्ट व कार्रवाई का मांगा गया विवरण*

  • ssoni43
  • Oct 24, 2025
  • 3 min read

Mumbai

अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कॉन्फडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर ने बताया सरकार द्वारा सालों से चलाएं जा रहे जनजागरूकता अभियानों के बावजूद छोटे भोजनालय और सड़क किनारे ठेले वाले अब भी बार-बार इस्तेमाल किया हुआ तेल (रीयूज्ड कुकिंग ऑयल) प्रयोग कर रहे हैं।

पुनः प्रयुक्त तेल के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कई प्रकार के प्रभाव पड़ सकते है।

बार-बार गर्म किया गया तेल जब कई बार तलने के लिए इस्तेमाल होता है तो उसमें टोटल पोलर कंपाउंड (TPC) नामक विषैले तत्व बन जाते हैं। जब तेल को लंबे समय तक ऊँचे तापमान और नमी में रखा जाता है, तो उसका TPC स्तर बढ़ता जाता है। ऐसा तेल जब मनुष्य के शरीर में जाता है तो वह हृदय रोग, उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), धमनियों में रुकावट (एथेरोस्क्लेरोसिस), लीवर रोग, अल्ज़ाइमर और कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है। बार-बार गर्म करने से तेल में ट्रांस-फैट भी बढ़ता है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम और बढ़ जाता है।

एफएसएसएआई द्वारा इस्तेमाल किए हुए तेल को खरीदने के लिए रुको नामक अभियान 2018 से चलाया जा रहा है लेकिन इसमें कर्मियों के कारण सफलता नहीं मिल पा रही है।

2018 में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने "रिपर्पस यूज्ड कुकिंग ऑयल" (RUCO) अभियान शुरू किया था।

इसका उद्देश्य था कि इस्तेमाल किया हुआ तेल इकट्ठा कर उसे बायोडीज़ल में बदला जाए, ताकि पर्यावरण प्रदूषण घटे और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़े।


रुको का ढांचा तीन स्तंभों पर आधारित था —

1. Education (शिक्षा) – खाद्य व्यवसायों को यह सिखाना कि दोबारा इस्तेमाल किया तेल कितना हानिकारक है।

2. Enforcement (अनुपालन) – नियमित जांच और नियमों का पालन सुनिश्चित करना।

3. Ecosystem (पारिस्थितिकी तंत्र) – रेस्टोरेंट्स, संग्रह एजेंसियों और बायोडीज़ल निर्माताओं के बीच नेटवर्क बनाना।


लेकिन शिकायतों के अनुसार, यह योजना ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाई है, खासकर छोटे कस्बों और असंगठित क्षेत्रों में।

बड़े होटल और चेन रेस्टोरेंट्स कुछ हद तक नियमों का पालन करते हैं, परंतु हजारों छोटे ठेले, ढाबे और भोजनालयों में कोई निगरानी नहीं होती। इनमें से कई को TPC जैसे शब्दों की जानकारी तक नहीं है, और तेल का पुनः उपयोग या पुनर्विक्रय बहुत आम है।

भारत में हर साल लगभग 2,500 करोड़ लीटर वनस्पति तेल की खपत होती है, जिसमें से लगभग 40% हिस्सा होटलों, रेस्टोरेंटों और स्ट्रीट फूड विक्रेताओं द्वारा उपयोग किया जाता है। यदि यह तेल बार-बार इस्तेमाल होता है या गलत तरीके से फेंका जाता है, तो यह न केवल खाने को जहरीला बनाता है, बल्कि मिट्टी और जल स्रोतों को भी प्रदूषित करता है। छोटे विक्रेताओं और ढाबों की पंजीकरण और निगरानी में भारी कमी भी एक वजह है। राज्य स्तरीय फूड रेगुलेटरी एजेंसियाँ संसाधनों की कमी और जनशक्ति की कमी से जूझ रही हैं। जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम छोटे व्यवसायों तक नहीं पहुँचते। इस्तेमाल किया तेल एकत्र करने के लिए संग्रह नेटवर्क (collection network) बहुत सीमित है। कई विक्रेता पुराने तेल को बेच देते हैं या नालियों में बहा देते हैं, जिससे पर्यावरणीय क्षति होती है।

22 अक्टूबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने FSSAI को नोटिस जारी किया है और दो सप्ताह के भीतर राज्यवार रिपोर्ट व कार्रवाई का विवरण मांगा है। यह कदम भोपाल स्थित NGO “सार्थक सामुदायिक विकास एवं जन कल्याण संस्था” की शिकायत के बाद उठाया गया।

शिकायत में कहा गया कि एफएसएसएआई का रुको अभियान छोटे व्यवसायों और सड़क किनारे विक्रेताओं के बीच असफल रहा है।

NHRC के सदस्य प्रियंक कानूंगो ने कहा “प्रथम दृष्टया शिकायत सही प्रतीत होती है और यह पूरे देश की समस्या है, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए तुरंत सुलझाने की आवश्यकता है।”

*शंकर ठक्कर ने कहा इस प्रकार के अभियान को सफल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर जन जागरण करने की आवश्यकता है। और इसमें इस से संबंधित सभी हितधारकों को शामिल करने की आवश्यकता है। इसके अलावा सरकार को यदि बायोडीजल बनाने के लिए इस्तेमाल किया हुआ तेल कम दामों पर नहीं मिल रहा है तो सरकार द्वारा इसमें सब्सिडी दी जानी चाहिए। बायोडीजल की बिक्री बढ़ाने संबंधित जन जागरूकता लानी चाहिए। डॉक्टर एवं अस्पताल में भी इस संबंध जानकारी दी जानी चाहिए तब जाकर इस अभियान को सफलता मिल पाएगी*




 
 
 

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